Friday, July 27, 2012

अन्ना व बाबा रामदेव का परिवेश व परिवर्तनकारी तबके के लिये चुनौती : एक पहलू !

 मेरे इस आलेख के दो पहलू हें:
(१.) अन्ना व बाबा रामदेव का परिवेश
(२.) परिवर्तनकारी तबके के लिये चुनौती
(i) इस आलेख का उद्देश्य ,
अन्ना व रामदेव एक साधारण घर व परिवेश व पृष्ठभूमि से आये हें तथा इन्होने इस आन्दोलन से पहले जनता में कार्य करते हुवे बहुत पहले अपना स्थान बनाया था. आखिर कौनसी परिस्थितियों व अंतर्विरोध हैं जिसके चलते क्रांतिकारी तबका इन जेसे लोगों द्वारा किये जा रहें कार्यों को प्रारंभ में नहीं समझ पाता हैं ?
(ii) मेरा नोट इस पर केंद्रित हें कि;
तथाकथित परिवर्तनकारी व क्रांतिकारी तबका आखिर गांव व मोहल्लों में काम करने वाले अनेक लोगों से उपेक्षित भाव क्यों रखते? क्यों इन जैसे अनेको को साथ नहीं जोड़ पाते? भारत की धरती में इन तथाकथित क्रांतिकारी तबके कि सोच के अलावा भी तो समाज का द्वंद है. क्या इस समाजिक द्वंद से सीखकर आगे बढने वालो से यह क्रांतिकारी तबका कुछ सीख सकता हें?
आज के भारतीय राजनितिक परिदृश्य में लगभग सभी जगह पर करीब करीब सभी राष्ट्रीय राजनीतिक पार्टियों से आम जनता, मध्यम वर्ग, किसान व मजदूर वर्ग का मोहभंग हो चूका हैं तब बिना सार्थक व प्रासंगिक विकल्प दिए व जनता को साथ लिये व्यवस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तन की बात करनेवालो के लिये यह सबसे गंभीर संकट हैं. आज जो समाज की दुर्गति हम देख रहें यह सब अचानक नहीं हुवा. राजनीति का यह स्वरूप तथा उससे जुड़ी हुयी परिघटनायें भी रातो रात इस रूप में नहीं प्रकट हुवी हैं. समाज की इस अवसादग्रस्त अवस्था से ऐसा लगता हैं की ये 'क्रांतिकारी' देश व काल की वस्तुगत परिस्थितियों का सामयिक व प्रासंगिक परिवेश के अनुकूल विश्लेषण करने में असफल रहें हैं !
(III)आखिर जनता में व्याप्त असंतोष के चलते पैदा हुवी इस सामाजिक-राजनेतिक शुन्यता को कोन भरे ?
आज जब इस राजनीतिक शून्यता को 'नए' बाबा व अन्ना हजारे तथा इनके समर्थकों ने (चाहे किसी के सहयोग व सरंक्षण में ही सही ) एक नए तरह के आन्दोलन में बदल दिया हैं तब केवल यह 'क्रांतिकारी' तबका व उनके संगठन अब इसका फोरी तौर पर विश्लेषण कर रहें हैं. अब यही 'क्रांतिकारी' तबका इस अवस्था में भारतीय राजनीति के मौलिक अन्तर्विरोधो के रहते तथा समझे बिना ना तो इस आन्दोलन को कोई नई दिशा दे सकते व ना ही अपनी कोई सार्थक भूमिका निभा सकते. विडंबना यह भी देखिये कि इन मुद्दों का केवल ये समर्थन ही कर सकते हैं और बस मूकदर्शक बने रह सकते हैं ! अब बाबा व अन्ना हजारे के आन्दोलन इस सामाजिक-राजनेतिक शुन्यता को भर रहें हैं. यह लगभग २ वर्ष का समय समेटे हुवे हैं ! यह इस बात का द्योतक हैं यह 'क्रांतिकारियों' तबका भारतीय समाज व राजनीति के मोलिक अन्तर्विरोधो को समझने में ना केवल असफल रहा बल्कि अपने राजनितिक लक्ष्य की भी सही दिशा नहीं पहचान पाया. शायद 'आजादी' के बाद देश व इन 'क्रांतिकारियों' के लिये यह सबसे कठिन समय हैं. केवल अन्ना बाबा के आन्दोलन ही नहीं बल्कि बिना विकल्प के असहाय होकर विखंडित होती केन्द्रीय सत्ता सबसे बड़ी त्रासदी भी हैं !
. पहला नाम व उदहारण अन्ना हजारे का हैं जिन्होंने अपनी फौज की नोकरी के बाद ताउम्र जनता की सेवा की हैं. आज जिस मुकाम पर ये हैं अगर हम इस पर अधिक बात ना भी करे तो अन्ना जी लगभग २ वर्ष पहले तो राजनीति के हाशिए पर ही थे ! हाँ, यह जरुर कहा जा जा सकता हैं की वे लगभग १५ वर्षों से पहले ही समाज में स्थापित हो चुके थे. भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक लामबंदी करने के लिये इन्हें कैसे व क्यों तलाशा गया व एक आन्दोलन का  नेतृत्व प्रदान किया गया हैं इन सब बातों कि पृष्ठभूमि पर यह नोट नहीं लिखा जा रहा हैं. हम कहना यही चाहते हैं की भारत के समाज में अनेक लोग विभिन्न क्षेत्रो में जबरदस्त ईमानदारी से कार्य कर रहें हैं तथा यही लोग समाज, जनता व सरकारों से अपने कार्य का लोहा भी मनवाते हैं. इनमे से अधिकाँश के नहीं, तो कइयों के नाम तारीफे के काबिल होते हैं. सवाल यह पैदा होता हैं कि आखिर भारत का वह वर्ग जो परिवर्तन व क्रांतिकारी बदलाव की बात करता हैं उसकि नजरों में आखिर ऐसे लोग ध्यान में क्यों नहीं आते ? इनसे संपर्क क्यों नहीं साधा जाता? आखिर परिवर्तनकारी व क्रांतिकारी वर्ग समाज के मूल सरोकारों का देश व काल कि पृष्टभूमि में आंकलन क्यों नहीं करते हैं? इन परिस्थितियों के चलते यह क्रान्तिकारी तबका समाज कि मुख्यधारा से नहीं जुड़ पाता जिसके परिणामस्वरूप इन आंदोलनों से या द्वारा अपने आप को हाशिए पर धकेल दिया हुआ पाता हैं.
२. दूसरा उदहारण बाबा रामदेव का हैं जो एक समय में बायसकल पर बैठकर च्यवनप्राश बेचते थे; इस व्यवस्था की अनेक कठिनाई के दौर से गुजरते हुवे लगभग ८ या ९ वर्ष पहले स्थापित हुवे थे. इनकी कई गलतियों रही होगी व कठिनाई भी पर इन 'क्रांतिकारियों' को उनकी दवाइयों में 'मानव' हड्डियां तो दिख गई मगर सेकडों रूपये की पश्चिम कि दवा जब भारत में लाखों रूपये में एक षडयंत्र के द्वारा बेचीं जाती हैं तो नहीं दिखती ! मुख्य बात जिसे मैं इस नोट के माध्यम से उठाना चाहता हूँ वह यह हैं कि बाबा व अन्ना जैसे कई लोग इस देश में ग्रासरूट पर इस समाज के विकेन्द्रित ढांचे में शानदार कार्य कर रहें हैं पर उनकी तरफ इन क्रांतिकारी का ध्यान ही नहीं जाता या जानबुझकर ऐसे लोगों को अनसुना कर दिया जाता हैं. रामदेव जेसे व्यक्तियों का ज्ञान व ध्यान 'क्रांतिकारियों' को पिछड़ा लगता हैं. इससे यह बात प्रमाणित होती हें कि यह क्रांतिकारी वर्ग भारतीय समाज, परिवेश, ज्ञान, विचार आदि के प्रति पूर्वाग्रह रखता हैं. अगर नहीं तो अन्ना व बाबा जेसे कई लोग इन ''जनसेवको'' व ''क्रान्तिकारियों'' के साथ होते ! अब ये लोग रोना रोते हैं की बाबा संघ का आदमी हैं.. बाबा संघ के साथ हो या ना हो वे राजनीति के प्रति तटस्थ तो नहीं हैं रह सकते. बाबा तो फिर क्या इनका (क्रान्तिकारियों का)  इंतजार करते कि कब ये लोग आये व कब मुझे संबल मिले?
क्रांतिकारी तथा परिवर्तनकारी अक्सर यह कहते हैं कि, ''कोई भी व्यक्ति राजनीति से अलग नहीं हैं तथा ऐसे समय में हमें सोचना चाहिए कि हमारी क्या राजनीति हो ''? वंही दूसरी तरफ अपने पूर्वाग्रह से ग्रसित यही लोग समाज की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था में काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्तायों को  शुरू में ही सामंती, दकियानुसी, रुढिवादी, कट्टरपंथी, धार्मिक, अधार्मिक आदि से पुकारकर अपने स्वयं के प्रति उनमे अलगाव की धारणा को पैदा कर दूरियां बाधा देते हैं. इस प्रारम्भिक अवस्था में ही ये सामाजिक कार्यकर्ता इनसे उपेक्षित हो जाते हैं. कुछ लगनशील सामाजिक कार्यकर्ताओ कि राजनीति ही होती हैं तभी तो वे इस लोकतन्त्र में अपने लिये जगह ढूँढते हुवे प्रत्यक्ष राजनीतिक सरोकारों से जुड़कर सत्ता के विरोध में खड़े होते हैं. अगर पहले से ही राजनीतिक शून्यता हैं तब वे जनता कि बड़ी लामबंदी अपने पीछे जुटा लेते हैं. 
मेरे आलेख के पीछे के भावो का निहितार्थ यही हैं की जो क्रांतिकारी व व्यवस्था परिवर्तन की बात करते हैं वे पहले समाज के मूल अंतर्विरोध को समझे तथा उसी के अनुसार रणनीति व कार्यनीति बनाये ! देश की 'आजादी' के ६५ होने को आये पर समाज व राजनीति की दुर्गति ही देखती हैं. इसे देख व समझ कर एक सच्चे क्रांतिकारी से सहजभाव भाव से यही शब्द निकलेंगे व उसकी यही पुकार होगी की हे परीवर्तनकार्यों आखिर तुम्हे जमीन से जुड़े सामाजिक व राजनेतिक व्यक्ति क्यों नहीं दिख पाते? आखिर आपने सत्य को देखने का कौनसा चश्मा पहन रखा हैं?
 हें क्रांतिकारियों ! समय ना तो किसी को माफ़ करता व ना ही किसी से रुकता ! यह प्रकृति का सत्य हैं.

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